साधन रहित व्येक्तियों के लिए प्रमेह की विशेष चिकित्सा बताते हुए आचार्य सुश्रुत ने लिखा है की धनहीन या बंधू बांधव रहित प्रमेह का रोगी बिना जूता पहने तथा छठा लगाये भिक्षावृति धारण करते हुए ,एक ग्राम में एक दिन ठहर कर ,मुनि के समान इन्द्रियों को बस में करके , सौ योजन या इससे अधिक यात्रा करे, तथा अतुल सम्पतिसाली, श्यामक और नीवार (चावल ) बनाकर आमला ,कैथ , तेंदू तथा आवस्यक फलाहार करते हुए मृगों के सामान रहें ,एवं गौ के मूत्र का सेवन करते हुए निरंटर उसके पीछे भ्रमण करें / यदि रोगी ब्राहमण हो तो शिलोचवृति धारण कर ब्राहमणरथ का उद्धार करे या वेदाध्यन करे / सूद्र निरंतर कृषि करे या कूप खोदे परन्तु क्रश रोगी कठिन कार्य न करें / -- सुo चिo अo ११/१२
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