कैंसर रोग में
यह बड़ा ही भयानक रोग है ,इस वैज्ञानिक युग के चकाचोंध मे भी अभी तक कोई ऐसी दवा नहीं निकल पाई है ,उसकी अपेक्षा स्वमूत्र का प्रयोग अत्यधिक लाभ दायक और निरापद है ,प्रतिदिन स्वमूत्र का दिन में तीन चार बार पान करते रहने से १-१ माह में ही संतोष जनक लाभ दिखाई देता है किन्तु रोग पूर्ण लाभ होने तक इसका प्रयोग जारी रखना आवश्यक है साथ ही साथ मूत्र की मालिश और पट्टी भी लगाते रहना चाहिए /आवस्यक सुचना :- कैंसर के रोगी की प्रकृति ,अवस्था एवं मूत्र पचाने की शक्ति आदि बातों को ध्यान में रखते हुए मूत्र उपचार की वएवस्था तत्काल शुरू करनी चाहिए , कारण की यह रोग तीव्र गति से बढता है ,जिस कैंसर पर रेडियम या करेंट न लगा हो वह सिधर मिट जाता है परन्तु सल्य क्रिया व् करेंट क्या गया हो तो थोडा समय लगता है/ चितिक्सा काल में अगर उपवास करने की आवश्यकता आ पड़े तो ऐसी हालत में दिन रात का सारा मूत्र पी जाना चाहिए ,उपवास में यदि रोगी को कै,दस्त लगे तो घबराने की जरुरत नहीं है ; वह तो शरीर का विष मात्र है ,उपवाश काल में मूत्र के शिवा खाने को कुछ न दें ,उपवास के बाद आधा पाव गरम जल में नीबू का रस एक चम्मच और दो चम्मच शहद मिला कर चमचे से धीरे धीरे पिलायें , इसके बाद जितने उपवास कियें हों उतने दिनों तक फल का जूस ,मुंग का जूस ,दूध और पानी मिलाकर तुलसी का काड़ा आदि पेये पदार्थ लेते रहें ,जैसे जैसे अग्नि प्रदीप्त होती जाये वैसे वैसे आहार की मात्रा बढ़ाते जाएँ और अंत में पूर्ण खुराक पर आ जाएँ अन्यथा अधिक भोजन से दस्त आने लगेंगे ,अतः खूब सावधान रहें , और खाने के लिए अधीर हो कर सारी मेहनत पर पानी न फेरें , द्यान रहे कैंसर के रोगी को नमक बिलकुल छोड़ देना चाहिए तथ जब तक ठीक न हो जाये परहज एवं मालिश करते रहें साथ ही दिन में एक दो बार तीन तीन ऑस पेशाब पीते रहें /
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