शनिवार, 27 मार्च 2010
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आयुर्वेदिक जानकारी तथा वृक्ष ,लताओं , पुष्प ,बीज ,छाल, तना का सचित्र वर्णन /
अंडवृद्धि
अंडकोष का जल सुख पूर्वक निकालने का उपाय मुठी भर इमली की पत्ती लाकर किसी मिटटी के पात्र में रख कर इतना "गो मूत्र " डालें की पत्ती डूब जाये तथा आग पर रख दें / जब गो मूत्र कम हो जाये पुनः ही उतना गोमूत्र डालकर औटाये / इस प्रकार ३ बार गोमूत्र डालकर औटाये , बाद में गर्म गर्म पत्तियों को निकल कर किसी बरगद या अरंडी के पत्ते पर पत्तियों को रख कर बांध दें ,उपर से कपडे की पत्ती बांध दें , फिर लंग्गोट बांध लें , यह क्रिया रात्रि को करें / इस तरह ७-१४ दिन या २१ दिन बंधने से कठिन से कठिन अंडवृद्धि का जल निकलकर पूर्ववत नरम हो जायेंगे / १०२
नोट :- अंडकोष यदि कद्दू के सामान भारी हो तब उपरोक्त विधि से ही कार्य करें, सिर्फ दवा औताते समय बफारा विधि अपनाते अनुसार चारपाई पर बैठ कर उस मिटटी के पात्र पर जिसमें पत्तियां औटती हैं एक कीप टीन की रख कर अंडकोशों पर बफारा लेते रहे , बाद में पत्ती सुहाती सुहाती बांध उपरोक्त विधि अनुसार लंग्गोट कस लिया जाये, इससे वृषण पर किसी प्रकार का अहित परिणाम न होगा और बगैर शस्त्र क्रिया के आराम हो जायेगा /
-- श्रीयुत पंo श्री कृष्ण चन्द्र जी त्रिपाठी /
नोट :- अंडकोष यदि कद्दू के सामान भारी हो तब उपरोक्त विधि से ही कार्य करें, सिर्फ दवा औताते समय बफारा विधि अपनाते अनुसार चारपाई पर बैठ कर उस मिटटी के पात्र पर जिसमें पत्तियां औटती हैं एक कीप टीन की रख कर अंडकोशों पर बफारा लेते रहे , बाद में पत्ती सुहाती सुहाती बांध उपरोक्त विधि अनुसार लंग्गोट कस लिया जाये, इससे वृषण पर किसी प्रकार का अहित परिणाम न होगा और बगैर शस्त्र क्रिया के आराम हो जायेगा /
-- श्रीयुत पंo श्री कृष्ण चन्द्र जी त्रिपाठी /
बुधवार, 24 मार्च 2010
गौ मूत्र
गौमूत्र का प्रमेह्हर योग
साधन रहित व्येक्तियों के लिए प्रमेह की विशेष चिकित्सा बताते हुए आचार्य सुश्रुत ने लिखा है की धनहीन या बंधू बांधव रहित प्रमेह का रोगी बिना जूता पहने तथा छठा लगाये भिक्षावृति धारण करते हुए ,एक ग्राम में एक दिन ठहर कर ,मुनि के समान इन्द्रियों को बस में करके , सौ योजन या इससे अधिक यात्रा करे, तथा अतुल सम्पतिसाली, श्यामक और नीवार (चावल ) बनाकर आमला ,कैथ , तेंदू तथा आवस्यक फलाहार करते हुए मृगों के सामान रहें ,एवं गौ के मूत्र का सेवन करते हुए निरंटर उसके पीछे भ्रमण करें / यदि रोगी ब्राहमण हो तो शिलोचवृति धारण कर ब्राहमणरथ का उद्धार करे या वेदाध्यन करे / सूद्र निरंतर कृषि करे या कूप खोदे परन्तु क्रश रोगी कठिन कार्य न करें / -- सुo चिo अo ११/१२
मंगलवार, 23 मार्च 2010
Cancer
कैंसर रोग में
यह बड़ा ही भयानक रोग है ,इस वैज्ञानिक युग के चकाचोंध मे भी अभी तक कोई ऐसी दवा नहीं निकल पाई है ,उसकी अपेक्षा स्वमूत्र का प्रयोग अत्यधिक लाभ दायक और निरापद है ,प्रतिदिन स्वमूत्र का दिन में तीन चार बार पान करते रहने से १-१ माह में ही संतोष जनक लाभ दिखाई देता है किन्तु रोग पूर्ण लाभ होने तक इसका प्रयोग जारी रखना आवश्यक है साथ ही साथ मूत्र की मालिश और पट्टी भी लगाते रहना चाहिए /आवस्यक सुचना :- कैंसर के रोगी की प्रकृति ,अवस्था एवं मूत्र पचाने की शक्ति आदि बातों को ध्यान में रखते हुए मूत्र उपचार की वएवस्था तत्काल शुरू करनी चाहिए , कारण की यह रोग तीव्र गति से बढता है ,जिस कैंसर पर रेडियम या करेंट न लगा हो वह सिधर मिट जाता है परन्तु सल्य क्रिया व् करेंट क्या गया हो तो थोडा समय लगता है/ चितिक्सा काल में अगर उपवास करने की आवश्यकता आ पड़े तो ऐसी हालत में दिन रात का सारा मूत्र पी जाना चाहिए ,उपवास में यदि रोगी को कै,दस्त लगे तो घबराने की जरुरत नहीं है ; वह तो शरीर का विष मात्र है ,उपवाश काल में मूत्र के शिवा खाने को कुछ न दें ,उपवास के बाद आधा पाव गरम जल में नीबू का रस एक चम्मच और दो चम्मच शहद मिला कर चमचे से धीरे धीरे पिलायें , इसके बाद जितने उपवास कियें हों उतने दिनों तक फल का जूस ,मुंग का जूस ,दूध और पानी मिलाकर तुलसी का काड़ा आदि पेये पदार्थ लेते रहें ,जैसे जैसे अग्नि प्रदीप्त होती जाये वैसे वैसे आहार की मात्रा बढ़ाते जाएँ और अंत में पूर्ण खुराक पर आ जाएँ अन्यथा अधिक भोजन से दस्त आने लगेंगे ,अतः खूब सावधान रहें , और खाने के लिए अधीर हो कर सारी मेहनत पर पानी न फेरें , द्यान रहे कैंसर के रोगी को नमक बिलकुल छोड़ देना चाहिए तथ जब तक ठीक न हो जाये परहज एवं मालिश करते रहें साथ ही दिन में एक दो बार तीन तीन ऑस पेशाब पीते रहें /
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