- दिन में दो बार मूली का रस थोड़ा नमक मिलाकर तीन दिन के प्रयोग से पेट के कीड़े मर कर मॉल के साथनिकल जाते हैं।
- पके केले का गूदा नीबू के रस में पीसकर मलहम के समान खाज खुजली , दाद तथा गंजेपन पर लेप करने से लाभ है ।
- शराब में प्याज को पकाकर लगाने से खुजली मिट जाती है ।
- गठिया के दर्द में , शिर फर्द में , कमर दर्द में लौंग का तेल मालिश करने से आराम पहुंचता है ।
- अदरक के रस में पुराना गुड़ मिलाकर खाने से सारे बदन की सूजन समाप्त हो जाती है ।
- घाव पर हल्दी बुरकने से से घाव जल्दी भर जाता है ।
- दो तीन काली मिर्च खाने से मलेरिया उतर जाता है ।
- अदरक के रस को शहद के साथ चाटने से खांसी ,सर्दी ,जुखाम में आराम मिलता है ।
- पेट की जलन में आधे नीबू का रस पानी के साथ मिलाकर पीने से आराम मिलता है ।
- दाद व चर्म रोग में कच्चे पपीते का दूध लगाने से आराम मिलता है ।
- चेहरे के मुहासे , फुंसियाँ ,व्रण में संतरे का चिल्का रगड़ने से लाभ होता है ।
- गर्मी के मौसम में दस्त होने पर नीम के पत्तों का रस मिश्री में मिलाकर पीने से दस्त ठीक हो जाते हैं ।
- जीभ के छाले में पका केला गाये के दही के साथ प्रातः काल खाने से लाभ होता है ।
- पुदीने का सेवन करने से पेशाब खुल कर आता है
शनिवार, 17 जुलाई 2010
घरेलू नुस्से-1
एड्स
चिकित्सीय परिभाषा के अनुसार व्येस्कों में एड्स होने पर निश्चित रूप से दो मुख्य संकेत और कम से कम एक साधारण संकेत प्रकट होता है । और इनके असली कारण की जानकारी न होने के कारण इसे इम्पुनो स्प्रेसन ( प्रतिरक्षा घुटन ) कहते हैं।
व्येस्कों के एड्स की चिकित्सीय स्पस्टता मिख्या संकेत या लक्षण :वजन घाटता है , कम से कम शरीर का १० प्रतिशत वजन
चिरकालिक दस्त होते हैं ,कम से कम एक माह से ज्यादा
लम्बे समय तक बुखार रहता है रुक रुक कर
साधारण संकेत या लक्षण :-
सामान्य त्वचा में पीलापन
एक महीने से ज्यादा खांसी
मुख एवं कंठ में संक्रमण ( गले में फफूंदी )
सामान्य लिम्फ ग्रंथियों में वृद्धि
बड़े लोगों में संक्रोम या स्ट्राईप्तोकोकल मेनिन्जाइतिस की उपस्थिति एड्स वैज्ञानिक जाच के लिए अपने आप में पर्याप्त है ।
बाल्य काल में होने वाले एड्स के मुख्य और साधारण संकेत : इस अवस्था में इन्युनो स्प्रेसन ( प्रतिरक्षा घुटन ) जैसी जनि बातों का आभाव होता है और उनमें कम से कम दो मुख्य एवं दो साधारण लक्षण अवश्य पाए जाते है जिनसे एड्स का चिकित्सीय निदान होता है ।
मुख्य संकेत :- वजन घटना या बदना , चिरकालिक दस्त , लगातार बुखार , खांसी , त्वचा का पीलापन ,कान में संक्रमण , मुख व गले में संक्रमण ।
यह हम कैसे सुनिश्चित करें की हमारे शरीर में एच.आई.वी संक्रमण न आये :-
किसी से भी यौन सम्बन्ध स्थापित करना बंद करें ।
सुई /सिरिंज जैसे चुभोने वाले बदल कर लगायें ।
चिडचिडा पन आने दें ।
बुधवार, 14 जुलाई 2010
एड्स 2
एच .आई.वी संक्रमित या दूषित रक्त या रक्त उत्पादों से
- आपके शरीर में एच.आई.वी का संक्रमण एच.आई.वी से दूषित रक्त या रक्त उत्पादों के द्वारा हो सकता है / यदि रक्त दाता को एच.आई.वी संक्रमण है /
- एच .आई.वी संक्रमित इंजेक्शन या सुइयों आदि द्वारा , खासकर नशीली दवाओं के सेवन करता जो ऐसे नशीले पदार्थ ( जैसे हेरोइन आदि ) अपने शरीर में सुई से लगाते हैं /
- एच.आई.वी का संक्रमण तब भी हो सकता है जबकि सल्य चिकत्सीय औजारों को ठीक से एच.आई.वी संक्रमण से साफ़ और परिशोधित न ही किया जाये /
- एच .आई.वी शरीर में तब भी प्रवेश कर सकता है जब किसी तेज धार से संक्रमित औजार से बिना साफ़ अवोम परिशोधित किये काम करने से त्वचा आदि कट जाये ९जैसे कान साफ़ करने वाला , गोदने वाला ,हजामत का रेज़र ,नेलकटर )/
- एच.आई.वी से ग्रषित किसी भी गर्भवती स्त्री के शरीर में गर्भस्थ शिशु (भ्रूण ) को या प्रसव के दौरान एच.आई.वी संक्रमण लग सकता है /
- विशेषज्ञों का विचार है की एच.आई.वी संक्रमित तीन माताओं में से एक के शिशु को एच.आई.वी संक्रमण हो सकता है /
- यहाँ पर ऐसे प्रमाण भी मिले हैं कि अमूमन इस प्रकार से एच.आई.वी संक्रमित शिशु दो साल से ज्यादा जीवित नहीं रहते /
- एच.आई.वी संक्रमित माँ द्वारा स्तन पान कराने से संक्रमण होने के अवसर न के बराबर होते हैं / इसी कारण यूनिसेफ एवं विश्व स्वस्थ संगठन विकास शील देशों में उपरी दूध देने कि अपेक्षा संक्रमित माँ का स्तन पान के लिए बढावा देते हैं / जिससे कई दूसरे संक्रमणों से सिरक्षा मिलती है /
यह केवल वेश्यायों और उनके ग्राहकों कि समस्या मात्र नहीं है /
यह केवल समलैंगिकों कि समस्या मात्र नहीं है /
यह केवल सुई से नशीली दवा लेने मात्र से नहीं है /
और न ही यह उनकी समस्या है जिन्हें रक्त सम्बन्धी समस्या के कारण बार बार रक्त कि जरूरत है /
आज एड्स सब की समस्या है / हम में से बहुत से लोग अनजाने मे ही एच.आई.वी प्रभावित हो सकते हैं / यद्दपि जोखिमपूर्ण व्येव्हार करता दूरारों की अपेक्षा कहीं ज्यादा जल्दी शिकार हो सकते हैं जैसे की :-
- जो लोग अनेक लोगों के साथ योन सम्बन्ध रखते हैं उन्हें एच.आई.वी होने की ज्यादा सम्भावना रहती है / यदि आप कभी कभार भी दूरारों के साथ यौन सम्बन्ध करते हैं तो भी एच.आई.वी लगने का जोखिम लगा रहता हैं/
- यौन संचारित रोगों ( एस .टी .डी) के कारण जिन लोगों के यौन अंगों में खुले घाव या स्राव होता है उन्हें इन घावों से बहुत आसानी से एच.आई.वी संक्रमण हो सकता है /
- जिन्हें जल्दी जल्दी रक्त दान लेना होता है ( यद्दपि यह उच्च जोखिम वाला व्येव्हार नहीं है,पर चिकत्सीय जरूरत होती है )/
एच.आई.वी संक्रमित वयेक्ति शुरूआती स्थिति में स्वस्थ एवं सही दिख सकता है / उन्हें यह नहीं मालूम होता है की वे एच.आई.वी को अपने शरीर में वहन कर रहे हैं / एच .आई.वी संक्रमण के मामलों में कई बार एक वयेक्ति पोसिटिव न होने के बावजूद दूसरे तक संक्रमण पहुंचा सकता है / जिसके लिए पहले बताये गाये किसी तरीके से संचार हो सकता है /...............शेष और .....
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
एड्स
एड्स के बारे में जानने के लिए बहुत कुछ
एच.आई.वी शरीर में कैसे पहुंचता है ?
संक्रमित व्येक्ती से असुरक्षित योन सम्बन्ध ( सम्भोग ):-
एड्स को उपार्जित ( एक्वायर्ड ) कहते हैं क्यूंकि यह हर समय किसी अन्य से लगता ( आता ) है / प्रतिरक्षा अक्षमता ( इम्प्यून डिफीसिएसी) का अर्थ है इसका विषाणु (virus ) शरीर के रक्षात्मक तंत्र के खिलाफ संघर्ष करता है / सम लकछण ( सिंड्रोम ) का अर्थ है की इस बीमारी के अनेक तरह के चिन्ह एवं लकछण होते हैं /
एच . आई . वी का मतलब हयूमन इम्पयूनो डिफीसिएसी वायेरस अर्थात मानव प्रतिरक्षा नाशक विषाणु / यही विषाणु एड्स बीमारी का वाहक होता है / एच आई वी संक्रमित आदमी के वीर्य , योनीस्राव , रक्त एवं रक्त उत्पादित शरीर के द्रव पदार्थों में पाया जाता है जो संक्रमित रक्त से बनते हैं / यदपि ऐसे भी प्रमाण मिले हैं की एच आई वी की उपस्थिति आंसुओं , पसीने , एवं माँ के दूध में भी होती है / परन्तु इतने कम होते हैं की दूसरों को संक्रमित नहीं कर पाते /
- यदि आप किसी एच.आई.वी संक्रमित पुरुष या स्त्री के साथ सम्भोग करते हैं तो आपको भी संक्रमण हो सकता है /
- यदि आप किसी वैश्या या बहुगामी स्त्री या पुरूष के साथ यौन संबंध करते हैं जोकि अनेक लोगों से यौन संबंध रखता है /
- यदि आप अलग अलग किस्म के बहुत से लोगों से यौन संबंध रखते हैं तो आपको एच.आई.वी संक्रमण होने के बहुत अधिक अवसर रहते हैं /
- किसी संक्रमित व्येक्ती के साथ सम्भोग से भी आप पहली बार में ही एच.आई.वी संक्रमण पा सकते हो /
सोमवार, 7 जून 2010
शिलाजीत
विविध रोगानुसार प्रयोग
१).शुद्ध शिलाजीत को त्रिफला (हर्र , बहेड़ा ,आंवला ) और शहद के साथ सेवन से प्रमेह का नाश होता है।
२).शुद्ध शिलाजीत को १ तोला मधु सोंठ १/२ तोला ,और १ पाव दूध के साथ सेवन करने से गठिया वाय में लाभ।
३). त्रिफला १ तोला एवं दूध के साथ शिलाजीत सेवन से कुष्ठ रोग में आराम मिलता है।
४). शिलाजीत, मुलहटी का सत १/२ तोला एवं गाये का दूध के साथ सेवन से मिर्गी रोग में लाभ होता है।
५).शिलाजीत , त्रिकुट और स्वर्णमाक्षिक भस्म के साथ सेवन से विष दूर होता है।
६).शिलाजीत माखन के साथ खाने से मस्तिस्क पुष्ट होता है।
७). शरीर शोधन के पश्चात यदि शिलाजीत को गुडूची क्वाथ से सेवन करें तो वात रक्त कुष्ट में लाभ होता है।
८). शिलाजीत कमजोरी में दूध के साथ सेवन करें।
९). १ तोला गौ मूत्र के साथ शिलाजीत मधुमेह में प्रयोग करें।
१०).नपुंसकता मे शिलाजीत आधा सेर गौ दुग्ध के साथ सेवन करें।
११). धातु क्षी ... में मिश्री मिला कर दूध के साथ सेवन करें ।
१२). मुलहटी के काड़े के साथ यदि शिलाजीत का प्रयोग करें तो रक्त पित का नाश करता है ।
१३). छोटी इलाइची और पीपल चूर्ण के साथ बलानुसार सेवन करें तो मूत्र कृच, मूत्रअवरोध,प्रमेह रोग दूर होते हैं।
१४). यह अनेक प्रकार की औषधियों में प्रयोग होता है जैसे चंद्रप्रभा वटी, शिलाजीत वटी आदि।
१५). असाध्य मधुमेह रोगी यदि पथ्यानुसार नियम पूर्वक ४०० तोले शिलाजीत प्रयोग करें तो उसका चोला नया हो जाता है जिसे वाग्भट कहते हैं .....
मधुमेह्त्वमापन्नी भिशगिभः परिवर्जितः।
शिलाजतु तुलानधयत प्रमेह्हर्तः पुनर्नवः ।।
वैध श्री रामशंकर पाठक ' दीनबंधु चिकित्सालय ' द्वारा लिखित नुक्से 'शेष '....
धनबाद
१).शुद्ध शिलाजीत को त्रिफला (हर्र , बहेड़ा ,आंवला ) और शहद के साथ सेवन से प्रमेह का नाश होता है।
२).शुद्ध शिलाजीत को १ तोला मधु सोंठ १/२ तोला ,और १ पाव दूध के साथ सेवन करने से गठिया वाय में लाभ।
३). त्रिफला १ तोला एवं दूध के साथ शिलाजीत सेवन से कुष्ठ रोग में आराम मिलता है।
४). शिलाजीत, मुलहटी का सत १/२ तोला एवं गाये का दूध के साथ सेवन से मिर्गी रोग में लाभ होता है।
५).शिलाजीत , त्रिकुट और स्वर्णमाक्षिक भस्म के साथ सेवन से विष दूर होता है।
६).शिलाजीत माखन के साथ खाने से मस्तिस्क पुष्ट होता है।
७). शरीर शोधन के पश्चात यदि शिलाजीत को गुडूची क्वाथ से सेवन करें तो वात रक्त कुष्ट में लाभ होता है।
८). शिलाजीत कमजोरी में दूध के साथ सेवन करें।
९). १ तोला गौ मूत्र के साथ शिलाजीत मधुमेह में प्रयोग करें।
१०).नपुंसकता मे शिलाजीत आधा सेर गौ दुग्ध के साथ सेवन करें।
११). धातु क्षी ... में मिश्री मिला कर दूध के साथ सेवन करें ।
१२). मुलहटी के काड़े के साथ यदि शिलाजीत का प्रयोग करें तो रक्त पित का नाश करता है ।
१३). छोटी इलाइची और पीपल चूर्ण के साथ बलानुसार सेवन करें तो मूत्र कृच, मूत्रअवरोध,प्रमेह रोग दूर होते हैं।
१४). यह अनेक प्रकार की औषधियों में प्रयोग होता है जैसे चंद्रप्रभा वटी, शिलाजीत वटी आदि।
१५). असाध्य मधुमेह रोगी यदि पथ्यानुसार नियम पूर्वक ४०० तोले शिलाजीत प्रयोग करें तो उसका चोला नया हो जाता है जिसे वाग्भट कहते हैं .....
मधुमेह्त्वमापन्नी भिशगिभः परिवर्जितः।
शिलाजतु तुलानधयत प्रमेह्हर्तः पुनर्नवः ।।
वैध श्री रामशंकर पाठक ' दीनबंधु चिकित्सालय ' द्वारा लिखित नुक्से 'शेष '....
धनबाद
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
प्रकृति भाग-३ Nature
रंग चिकित्सा के बारे में आप नेट पर भी खोज सकते हैं, अलग अलग रंगों के परिधानों को जब कोई धारण करता है तो हम अनायाश ही भांप लेते हैं , की उसका स्वभाव कैसा होगा। विभिन्न कार्यक्रमों तथा समारोहों में परिधान देखकर पता चल जाता है की किस प्रकार का कार्यक्रम है, तो मानव प्रकृति में ही प्रकृति समाई हुई है। ब्रह्ममांड में अनेक रहस्य छुपे हुए हैं जिन्हें मानव अभी तक १ प्रतिशत भी नहीं जन सका है।
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
प्रकृति भाग-2 Nature
वेदाचार्यों ने रंग चिकित्सा के बारे में विस्तार से ग्रंथो में लिखा हुआ है, प्रत्येक रंग का जीवन में अलग अलग महत्व बताया गया है, आधुनिक वैज्ञानिको ने भी इसका समर्थन क्या है तथा जांचा परखा भी है, सूर्य का प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना होता है ,वर्षा के पश्चात् लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला, तथा बैंगनी वर्णो का एक विशालकाय वृत्ताकार वक्र कभी-कभी दिखाई देता है। इसे इंद्रधनुष कहते हैं। परोक्छ रूप से यही रंग अलग अलग वृक्षों द्वारा कैमिकल प्रतिक्रिया के फलस्वरूप अवशोषित क्या जाता है अतः वृक्षों से प्राप्त जड़ी बूटियों में वही गुण विधमान होते हैं जिससे विभिन्न रोगों में उपयोग किया जाता है .....................सभी स्वयं के विचार हैं ।
Vedachary written in detail about the color therapy, each color value in life has been reported separately. Modern scientists have also supported the what is tested and verified. Sunlight is made up of seven colors. After rain, red, orange, yellow, green, sky-blue, blue, and violet characters of a giant circular curve appears. It is called Rainbow. Chemical reactions by the same color as a result of different trees so the trees absorb what is obtained from herbs are absorbed in the same property. Which are used in various diseases. ...................All own ideas.
Vedachary written in detail about the color therapy, each color value in life has been reported separately. Modern scientists have also supported the what is tested and verified. Sunlight is made up of seven colors. After rain, red, orange, yellow, green, sky-blue, blue, and violet characters of a giant circular curve appears. It is called Rainbow. Chemical reactions by the same color as a result of different trees so the trees absorb what is obtained from herbs are absorbed in the same property. Which are used in various diseases. ...................All own ideas.
सोमवार, 19 अप्रैल 2010
प्रकृति
पूरा ब्रहमांड कैसे बना होगा यह कौतूहल का विषय, जब हम सुदूर आकाश की ओर अँधेरी रात में देखते हैं तो चारो दिशाओं में कालिमा द्रष्टिगोचर होती है जो थोड़ी बहुत रोशनी नजर आती है वह हम तारों की कृपा से देख पाते हैं यदि तारे भी न हों तो हम कुछ भी नहीं देख सकते ( आप अकेले किसी बंद कमरे में रात को सारी बत्तियां बंद करके, बिना किसी बाहरी ध्वनी को सुने आप आंखे खोलकर देखने की कोशिश करें तथा सोंचे की सारे संसार से रौशनी विलुप्त हो चुकी है तब जो अनुभव आपको होगा वह कितना डरावना होगा ) जबकि चन्द्रमा से मिलने वाली रौशनी परावर्तित होकर आती है जैसे सूर्य को आइना दिखाने पर परावर्तित रोशनी दीवार पर दिखाई पड़ती है /
संसार में जो हरियाली,जंगल, खेत, जीव-जंतु , मानव, विज्ञानं, अविष्कार आदि रौशनी के कारण ही संभव हुआ यदि यह न होती तो कुछ भी न होता ( आज संसार के वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड की शुरुआत कैसे हुई इसकी खोज में लगे हुए हैं तथा 'लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर’ बिग बैंग नामक शीर्षक जिसमें नयूट्रोंस को टकराकर उत्पन्न उर्जा के द्वारा ब्रह्माण्ड रचना का पता लगाना ) हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों ने रौशनी के महत्व पहले ही समझ लिया था तथा यह भी पता कर लिया था की कौन कौन से वृक्ष किन औषधियों में प्रयोग कर सकते है क्यूँकी प्रत्येक वृक्ष सूर्य की किरणों के अलग अलग रंगों को अवशोषित करता है .................क्रमशः
संसार में जो हरियाली,जंगल, खेत, जीव-जंतु , मानव, विज्ञानं, अविष्कार आदि रौशनी के कारण ही संभव हुआ यदि यह न होती तो कुछ भी न होता ( आज संसार के वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड की शुरुआत कैसे हुई इसकी खोज में लगे हुए हैं तथा 'लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर’ बिग बैंग नामक शीर्षक जिसमें नयूट्रोंस को टकराकर उत्पन्न उर्जा के द्वारा ब्रह्माण्ड रचना का पता लगाना ) हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों ने रौशनी के महत्व पहले ही समझ लिया था तथा यह भी पता कर लिया था की कौन कौन से वृक्ष किन औषधियों में प्रयोग कर सकते है क्यूँकी प्रत्येक वृक्ष सूर्य की किरणों के अलग अलग रंगों को अवशोषित करता है .................क्रमशः
शनिवार, 27 मार्च 2010
http://ayurvedanatural.webs.com
आयुर्वेदिक जानकारी तथा वृक्ष ,लताओं , पुष्प ,बीज ,छाल, तना का सचित्र वर्णन /
अंडवृद्धि
अंडकोष का जल सुख पूर्वक निकालने का उपाय मुठी भर इमली की पत्ती लाकर किसी मिटटी के पात्र में रख कर इतना "गो मूत्र " डालें की पत्ती डूब जाये तथा आग पर रख दें / जब गो मूत्र कम हो जाये पुनः ही उतना गोमूत्र डालकर औटाये / इस प्रकार ३ बार गोमूत्र डालकर औटाये , बाद में गर्म गर्म पत्तियों को निकल कर किसी बरगद या अरंडी के पत्ते पर पत्तियों को रख कर बांध दें ,उपर से कपडे की पत्ती बांध दें , फिर लंग्गोट बांध लें , यह क्रिया रात्रि को करें / इस तरह ७-१४ दिन या २१ दिन बंधने से कठिन से कठिन अंडवृद्धि का जल निकलकर पूर्ववत नरम हो जायेंगे / १०२
नोट :- अंडकोष यदि कद्दू के सामान भारी हो तब उपरोक्त विधि से ही कार्य करें, सिर्फ दवा औताते समय बफारा विधि अपनाते अनुसार चारपाई पर बैठ कर उस मिटटी के पात्र पर जिसमें पत्तियां औटती हैं एक कीप टीन की रख कर अंडकोशों पर बफारा लेते रहे , बाद में पत्ती सुहाती सुहाती बांध उपरोक्त विधि अनुसार लंग्गोट कस लिया जाये, इससे वृषण पर किसी प्रकार का अहित परिणाम न होगा और बगैर शस्त्र क्रिया के आराम हो जायेगा /
-- श्रीयुत पंo श्री कृष्ण चन्द्र जी त्रिपाठी /
नोट :- अंडकोष यदि कद्दू के सामान भारी हो तब उपरोक्त विधि से ही कार्य करें, सिर्फ दवा औताते समय बफारा विधि अपनाते अनुसार चारपाई पर बैठ कर उस मिटटी के पात्र पर जिसमें पत्तियां औटती हैं एक कीप टीन की रख कर अंडकोशों पर बफारा लेते रहे , बाद में पत्ती सुहाती सुहाती बांध उपरोक्त विधि अनुसार लंग्गोट कस लिया जाये, इससे वृषण पर किसी प्रकार का अहित परिणाम न होगा और बगैर शस्त्र क्रिया के आराम हो जायेगा /
-- श्रीयुत पंo श्री कृष्ण चन्द्र जी त्रिपाठी /
बुधवार, 24 मार्च 2010
गौ मूत्र
गौमूत्र का प्रमेह्हर योग
साधन रहित व्येक्तियों के लिए प्रमेह की विशेष चिकित्सा बताते हुए आचार्य सुश्रुत ने लिखा है की धनहीन या बंधू बांधव रहित प्रमेह का रोगी बिना जूता पहने तथा छठा लगाये भिक्षावृति धारण करते हुए ,एक ग्राम में एक दिन ठहर कर ,मुनि के समान इन्द्रियों को बस में करके , सौ योजन या इससे अधिक यात्रा करे, तथा अतुल सम्पतिसाली, श्यामक और नीवार (चावल ) बनाकर आमला ,कैथ , तेंदू तथा आवस्यक फलाहार करते हुए मृगों के सामान रहें ,एवं गौ के मूत्र का सेवन करते हुए निरंटर उसके पीछे भ्रमण करें / यदि रोगी ब्राहमण हो तो शिलोचवृति धारण कर ब्राहमणरथ का उद्धार करे या वेदाध्यन करे / सूद्र निरंतर कृषि करे या कूप खोदे परन्तु क्रश रोगी कठिन कार्य न करें / -- सुo चिo अo ११/१२
मंगलवार, 23 मार्च 2010
Cancer
कैंसर रोग में
यह बड़ा ही भयानक रोग है ,इस वैज्ञानिक युग के चकाचोंध मे भी अभी तक कोई ऐसी दवा नहीं निकल पाई है ,उसकी अपेक्षा स्वमूत्र का प्रयोग अत्यधिक लाभ दायक और निरापद है ,प्रतिदिन स्वमूत्र का दिन में तीन चार बार पान करते रहने से १-१ माह में ही संतोष जनक लाभ दिखाई देता है किन्तु रोग पूर्ण लाभ होने तक इसका प्रयोग जारी रखना आवश्यक है साथ ही साथ मूत्र की मालिश और पट्टी भी लगाते रहना चाहिए /आवस्यक सुचना :- कैंसर के रोगी की प्रकृति ,अवस्था एवं मूत्र पचाने की शक्ति आदि बातों को ध्यान में रखते हुए मूत्र उपचार की वएवस्था तत्काल शुरू करनी चाहिए , कारण की यह रोग तीव्र गति से बढता है ,जिस कैंसर पर रेडियम या करेंट न लगा हो वह सिधर मिट जाता है परन्तु सल्य क्रिया व् करेंट क्या गया हो तो थोडा समय लगता है/ चितिक्सा काल में अगर उपवास करने की आवश्यकता आ पड़े तो ऐसी हालत में दिन रात का सारा मूत्र पी जाना चाहिए ,उपवास में यदि रोगी को कै,दस्त लगे तो घबराने की जरुरत नहीं है ; वह तो शरीर का विष मात्र है ,उपवाश काल में मूत्र के शिवा खाने को कुछ न दें ,उपवास के बाद आधा पाव गरम जल में नीबू का रस एक चम्मच और दो चम्मच शहद मिला कर चमचे से धीरे धीरे पिलायें , इसके बाद जितने उपवास कियें हों उतने दिनों तक फल का जूस ,मुंग का जूस ,दूध और पानी मिलाकर तुलसी का काड़ा आदि पेये पदार्थ लेते रहें ,जैसे जैसे अग्नि प्रदीप्त होती जाये वैसे वैसे आहार की मात्रा बढ़ाते जाएँ और अंत में पूर्ण खुराक पर आ जाएँ अन्यथा अधिक भोजन से दस्त आने लगेंगे ,अतः खूब सावधान रहें , और खाने के लिए अधीर हो कर सारी मेहनत पर पानी न फेरें , द्यान रहे कैंसर के रोगी को नमक बिलकुल छोड़ देना चाहिए तथ जब तक ठीक न हो जाये परहज एवं मालिश करते रहें साथ ही दिन में एक दो बार तीन तीन ऑस पेशाब पीते रहें /
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